HF News 24 विशेष टिप्पणी | कमजोर धाराओं का कवच और मजबूत सवाल
बरही थाना क्षेत्र में नाबालिग बच्चे के साथ हुई मारपीट की घटना में पुलिस की कार्रवाई अब केवल गिरफ्तारी और जमानत तक सीमित मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह प्राथमिकी में लगाए गए कानूनी प्रावधानों की गंभीर समीक्षा की मांग कर रही है।
सवाल यह नहीं है कि आरोपी को गिरफ्तार किया गया या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उसे कानून के सही और सख्त प्रावधानों के तहत पकड़ा गया?
क्योंकि जिस तरह की धाराएँ प्राथमिकी में जोड़ी गईं, उससे यह स्पष्ट होता है कि आरोपी के लिए जमानत का रास्ता पहले ही खोल दिया गया था।
प्राथमिकी में जोड़ी गई धाराएँ और उनका कानूनी प्रभाव
पुलिस द्वारा दर्ज प्राथमिकी में जिन धाराओं को शामिल किया गया, वे इस प्रकार हैं—
- धारा 352 बीएनएस — साधारण मारपीट (जमानती)
- धारा 126(2) बीएनएस — परिस्थिति-आधारित अपराध (जमानती)
- धारा 351(2) बीएनएस — धमकी से संबंधित प्रावधान (जमानती)
इन धाराओं का सीधा परिणाम यह हुआ कि पूरा मामला प्रारंभ से ही जमानती श्रेणी में चला गया।
अर्थात, गिरफ्तारी के बावजूद आरोपी के लिए अदालत से तुरंत जमानत प्राप्त करना कानूनी रूप से आसान हो गया।
धारा 115(2) जोड़ी गई, लेकिन प्रभावहीन क्यों?
हालाँकि प्राथमिकी में धारा 115(2) को जोड़ा गया, लेकिन इसके साथ:
- Juvenile Justice Act, 2015
- POCSO Act
जैसे सख्त और प्रासंगिक कानूनों को शामिल नहीं किया गया।
परिणामस्वरूप, यह धारा भी मामले को गंभीर और गैर-जमानती बनाने में असफल रही।
सबसे बड़ा और गंभीर प्रश्न: नाबालिग होने के बावजूद JJ Act क्यों नहीं?
पीड़ित बच्चा नाबालिग था — यह तथ्य निर्विवाद है।
इसके बावजूद Juvenile Justice Act, 2015 की धारा 75 (बाल क्रूरता) को प्राथमिकी में शामिल नहीं किया गया।
जबकि यही धारा:
- अपराध को गंभीर श्रेणी में लाती
- मामले को नॉन-बेलेबल बनाती
- और आरोपी को तुरंत जमानत से वंचित कर सकती थी
तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है—
क्या यह महज़ प्रशासनिक चूक थी, या कानूनी चयन में जानबूझकर की गई नरमी?
🚨 llजनभावना और कानून के बीच खाई
घटना के बाद:
- वीडियो वायरल हुआ
- जनआक्रोश उभरा
- पुलिस ने गिरफ्तारी दिखाई
- पैदल मार्च कर कार्रवाई का संदेश दिया
लेकिन अंततः कमजोर कानूनी धाराओं के कारण आरोपी को अदालत से ही जमानत मिल गई।
इससे आमजन के बीच यह भावना प्रबल हो रही है कि
“कार्रवाई दिखाने के लिए गिरफ्तारी हुई, लेकिन सजा से बचाने की तैयारी पहले से थी।”
पुलिस की भूमिका पर उठते सवाल
स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच अब यह चर्चा तेज है कि—
- क्या नाबालिग के साथ हिंसा को साधारण अपराध मान लिया गया?
- क्या कानून का चयन पीड़ित के बजाय आरोपी के हित में किया गया?
- क्या जनभावना और बाल अधिकारों को नजरअंदाज कर दिया गया?
तीखी प्रतिक्रिया में लोग कह रहे हैं—
“धन्य हैं थानेदार और बरही पुलिस, जिन्होंने नाबालिग के मामले में भी सख्त कानून लगाने की जरूरत नहीं समझी।”
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानून के जानकारों का मानना है कि:
“यदि पीड़ित नाबालिग है और उस पर शारीरिक हिंसा हुई है, तो Juvenile Justice Act की धारा 75 लागू करना स्वाभाविक और आवश्यक है। इसे न जोड़ना मामले को कमजोर करता है।”
HF News 24 के सवाल
HF News 24 प्रशासन और पुलिस से स्पष्ट सवाल पूछता है—
- नाबालिग पीड़ित होने के बावजूद JJ Act क्यों नहीं जोड़ा गया?
- क्या मामले की धाराओं की पुनः समीक्षा की जाएगी?
- क्या बच्चों के अधिकार केवल कागज़ी प्रावधान बनकर रह गए हैं?
निष्कर्ष
बरही की यह घटना अब केवल मारपीट का मामला नहीं, बल्कि कानूनी मंशा, पुलिस विवेक और बाल अधिकारों की वास्तविक स्थिति पर बड़ा प्रश्नचिह्न बन चुकी है।
यदि ऐसे मामलों में सही समय पर सख्त कानूनों का उपयोग नहीं किया गया, तो:
- अपराधियों का मनोबल बढ़ेगा
- पीड़ित परिवार न्याय से दूर होगा
- और समाज का कानून पर भरोसा कमजोर पड़ेगा
विशेष संपादकीय टिप्पणी — HF News 24
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