क्लासरूम में कैद बचपन, ज़मीन पर सिसकता परिवार — छह महीने से बेघर ज़िंदगी, फिर भी सिस्टम खामोश


✍️ आलोक राज : प्रबंध संपादक | HF News 24

दारू (हजारीबाग)

रहने को घर नहीं…
सोने को बिस्तर नहीं…
और जीने को सिर्फ मजबूरी…

दारू प्रखंड से सामने आई यह तस्वीर किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम की संवेदनहीनता का नंगा सच है। यहाँ दो गरीब परिवार पिछले छह महीनों से एक सरकारी विद्यालय के कमरों में ज़िंदगी काटने को मजबूर हैं। जिस स्कूल में बच्चों के सपनों को उड़ान मिलनी चाहिए थी, वही आज बेघर इंसानों की बेबसी का ठिकाना बन चुका है।

यह कहानी सिर्फ गरीबी की नहीं है—
यह सम्मान, सुरक्षा और मानवीय अधिकारों के कुचले जाने की कहानी है।


जहाँ किताबें होनी थीं, वहाँ आँसू हैं

मध्य विद्यालय दारू बालक के एक छोटे और तंग कमरे में अर्जुन भुईयां (पिता–जानकी भुईयां) अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहने को मजबूर हैं।
इस एक कमरे में—

  • 25 वर्षीय पिंटू भुईयां
  • 18 वर्षीय मिथलेश भुईयां
  • 16 वर्षीय लक्ष्मी कुमारी
  • 16 वर्षीय ममता कुमारी

अपनी ज़िंदगी किसी तरह खींच रहे हैं।

न दरवाज़े के भीतर निजता है,
न चारदीवारी के भीतर सुरक्षा,
न ठंड से बचने का कोई इंतज़ाम।

कड़ाके की ठंड में ज़मीन पर सोते हुए यह परिवार हर रात अपनी किस्मत से सवाल करता है
क्या गरीब होना अपराध है?


भाई का परिवार भी उसी दर्द में कैद

इसी विद्यालय के दूसरे कमरे में अर्जुन के भाई रामस्वरूप भुईयां अपने परिवार के साथ शरण लिए हुए हैं।
स्कूल के कमरे अब क्लासरूम नहीं रहे—
वे अस्थायी झोपड़ी बन चुके हैं,
जहाँ भविष्य नहीं, सिर्फ संघर्ष पलता है।


“हम इंसान हैं, जानवर नहीं” — व्यवस्था के मुँह पर करारा सवाल

परिवार के सदस्य रोते हुए बताते हैं कि उन्होंने—

  • बीडीओ
  • सीओ
  • जिला पार्षद

सबके सामने अपनी पीड़ा रखी।
लेकिन उन्हें घर देने के बजाय स्कूल के कमरे थमा दिए गए

अर्जुन भुईयां की आवाज़ काँपती है—

“हम इंसान हैं, जानवर नहीं।
बच्चों को स्कूल में पढ़ना चाहिए,
हमें स्कूल में रहना पड़ रहा है।
यह हमारी पसंद नहीं, हमारी मजबूरी है।”

यह वाक्य केवल दर्द नहीं,
यह व्यवस्था के मुँह पर एक तमाचा है।


बच्चों की पढ़ाई भी बंधक, शिक्षा भी हारी

इस अमानवीय हालात का असर सिर्फ इन परिवारों पर नहीं,
स्कूल के बच्चों की पढ़ाई भी इसकी बलि चढ़ रही है।

विद्यालय के प्रधानाध्यापक नंदकिशोर बताते हैं—

“हमारी सहमति के बिना परिवारों को स्कूल में ठहराया गया।
इससे पढ़ाई बाधित हो रही है।
यह स्थिति न बच्चों के लिए ठीक है,
न इन परिवारों के लिए।”

स्कूल अब शिक्षा का मंदिर नहीं,
प्रशासनिक विफलता का प्रतीक बनता जा रहा है।

विद्यालय भवन के सामने अर्जुन भुईयां

अधिकारियों की चुप्पी — सबसे बड़ा अपराध

इस गंभीर मुद्दे पर जब प्रशासनिक अधिकारियों से प्रतिक्रिया लेने का प्रयास किया गया,
तो सन्नाटा मिला।

न बयान,
न आश्वासन,
न संवेदना।

क्या गरीब की आवाज़ इतनी हल्की है कि वह सरकारी दीवारों तक नहीं पहुँचती?


सबको आवास के दावे, ज़मीन पर सिसकती सच्चाई

सरकारी योजनाओं में हर गरीब को घर देने के बड़े-बड़े दावे हैं,
लेकिन दारू में—

  • परिवार बेघर हैं
  • बच्चे ज़मीन पर सो रहे हैं
  • स्कूल ठिकाना बन चुका है
  • और सिस्टम खामोश है

यह विरोधाभास नहीं,
यह व्यवस्था की असफलता का प्रमाण है।


HF News 24 का सीधा सवाल

  • क्या इन परिवारों को उनका हक़—एक सुरक्षित छत—मिलेगा?
  • क्या बच्चों को फिर से स्कूल सिर्फ पढ़ाई के लिए मिलेगा?
  • या यह दर्द यूँ ही सरकारी फाइलों में दबा दिया जाएगा?

HF News 24 की टिप्पणी

यह खबर सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं है,
यह सोचने और सवाल करने के लिए है।

गरीबी अपराध नहीं है।
बेघर होना लाचारी है।
और लाचारी का फायदा उठाना अपराध से भी बड़ा पाप

अब वक्त आ गया है कि प्रशासन
काग़ज़ों से बाहर निकले,
और इन परिवारों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार दे।

HF News 24 इस मुद्दे को दबने नहीं देगा।
क्योंकि अगर आज इन परिवारों की आवाज़ नहीं उठी,
तो कल कोई भी सिस्टम की इस चुप्पी का शिकार हो सकता है।


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