झारखंड में कई वर्षों से सरकारी निर्माण कार्यों, सड़क परियोजनाओं, भवन निर्माण, पंचायत योजनाओं और विभागीय ठेकों में अत्यधिक कम बोली (Low Bidding) को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कई मामलों में ठेकेदारों ने 30%–60% तक कम दरों पर टेंडर डाला, जिसके बाद—
- काम अधूरा छोड़ दिया गया,
- निम्न गुणवत्ता सामग्री का उपयोग हुआ,
- परियोजनाएँ निर्धारित समय से लटक गईं,
- सरकारी धन और संसाधन बर्बाद हुए।
इसी संदर्भ में झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने सेवा अधिकार सप्ताह के उद्घाटन में बड़ा ऐलान किया।
क्या है नया प्रस्ताव?
न्यूनतम बोली सीमा तय
अब कोई भी ठेकेदार टेंडर राशि से 10% से अधिक कम बोली नहीं लगा सकेगा।
उदाहरण:
- यदि परियोजना राशि = ₹1 करोड़
- न्यूनतम बोली = ₹90 लाख (10% कम तक)
इससे 20%, 30%, 40% या 50% कम बोली लगाने की प्रवृत्ति रोकी जाएगी।
कैबिनेट में प्रस्ताव
मंत्री ने स्पष्ट कहा कि—
“यह नियम जल्द ही राज्य कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।”
इसका मतलब—यह अभी घोषणा स्तर पर है, लेकिन सरकारी प्रक्रिया की ओर बढ़ चुका है।
घोषणा का उदाहरण
मंत्री ने बताया—
- उनके क्षेत्र में ₹75 लाख की योजना थी
- ठेकेदार ने 48% कम दर पर बोली लगाई
- जिससे काम की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हुए
यही स्थिति इस बदलाव का मुख्य कारण बनी।
क्यों जरूरी है यह बदलाव?
1. घटिया निर्माण रोकने के लिए
बहुत कम दरों पर बोली लगाने वाले ठेकेदार अक्सर—
- सस्ती सामग्री का इस्तेमाल करते हैं
- समय पर काम पूरा नहीं करते
- कभी-कभी काम छोड़कर भाग जाते हैं
2. जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए
10% की सीमा के बाद—
- ठेकेदार को वाजिब लागत पर काम करना होगा
- तकनीकी गुणवत्ता का पालन करना पड़ेगा
3. भ्रष्टाचार और “डमी बिडिंग” पर रोक
खास समूहों द्वारा फर्जी कंपनियों के नाम पर बेहद कम दर पर बोली लगाकर ठेका हथियाने के मामले सामने आते रहे हैं। नया नियम इस नेटवर्क को चुनौती देगा।
इस बदलाव के संभावित फायदे
सरकारी परियोजनाओं की गुणवत्ता सुधरेगी
क्योंकि लागत बहुत नीचे नहीं जाएगी।
काम समय पर पूरा होने की संभावना बढ़ेगी
टेंडर प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होगी
अनुभवी और सक्षम ठेकेदार बढ़ेंगे
बहुत कम बोली लगाने वाले “अनकैपेबल कॉन्ट्रैक्टर्स” बाहर हो सकते हैं।
संभावित चुनौतियाँ
1. प्रतिस्पर्धा (Competition) कम हो सकती है
बहुत कम बोली लगाने वाले बाहर हो जाएंगे, जिससे बोलीदाता कम हो सकते हैं।
2. कुछ परियोजनाएँ महँगी पड़ सकती हैं
यदि न्यूनतम सीमा तय हो गई तो कीमतें थोड़ा ऊपर रह सकती हैं।
3. लॉबी और ठेकेदार यूनियनों का विरोध संभव
कुछ समूह इसे “बाजार स्वतंत्रता पर रोक” कहकर विरोध कर सकते हैं।
अन्य राज्यों में स्थिति
कुछ राज्यों ने न्यूनतम बोली सीमा नहीं, बल्कि इसके विकल्प अपनाए हैं—
- क्वालिटी–कास्ट बेस्ड सिस्टम
- L1 + Technical Score Model
- Performance Guarantee Model
लेकिन झारखंड का यह कदम मिनिमम डिस्काउंट लिमिट आधारित पहला बड़ा कदम होगा।
आगे की प्रक्रिया
इस प्रस्ताव को लागू होने के लिए—
1️⃣ कैबिनेट में मंजूरी
2️⃣ वित्त/निविदा नियमावली में संशोधन
3️⃣ विभागों को अधिसूचना जारी
4️⃣ जिले और प्रखंड स्तर पर निर्देश
इसके बाद यह नियम आधिकारिक रूप से लागू होगा।
निष्कर्ष
यह फैसला झारखंड में सरकारी परियोजनाओं के स्वरूप को काफी हद तक बदल सकता है।
- घटिया निर्माण,
- अधूरे काम,
- और अत्यधिक डिस्काउंट बोली की प्रवृत्ति
पर नियंत्रित असर पड़ने की संभावना है। - सरकार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है—
“सस्ता काम नहीं — सही काम!”
✍️ Pankaj Hindustani : Editor-in-Chief | HF News 24
https://chat.whatsapp.com/GPVSxk0fZqiBY2yKPTZsed?mode=ems_copy_t






