झारखंड
✍️ पंकज हिंदुस्तानी | Editor-in-Chief | HF News 24 | हजारीबाग़, 15 नवंबर 2025
झारखंड — एक ऐसा राज्य जिसकी धरती सोने से भी ज्यादा कीमती है।
जहाँ कोयले की खानें हैं, लोहा है, यूरेनियम है, बॉक्साइट है, ताँबा है, माइका है, पत्थर है —
यानी धरती के नीचे समृद्धि का अथाह खज़ाना छिपा है।
लेकिन जब ऊपर देखा जाए, तो वही झारखंड आज भी गरीबी, बेरोज़गारी और पलायन की त्रासदी झेल रहा है।
15 नवंबर 2000 को जब झारखंड बिहार से अलग होकर अस्तित्व में आया था, तो लोगों ने सपना देखा था —
“अब हमारी धरती के संसाधनों पर हमारा अधिकार होगा।”
लेकिन 25 साल बाद भी यह सपना अधूरा है।
खनिज संपदा — वरदान या अभिशाप?
झारखंड को “India’s Mineral Hub” कहा जाता है।
देश के कुल खनिज उत्पादन का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा अकेला झारखंड देता है।
धनबाद, चिरकुंडा, गिरिडीह, चाईबासा, रामगढ़, और हजारीबाग़ जैसे इलाके कोयला और लोहा उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं।
यहाँ की कोयला खदानें Bharat Coking Coal Limited (BCCL), Central Coalfields Limited (CCL) और Tata Steel, Hindalco, NTPC, SAIL जैसी कंपनियों के नियंत्रण में हैं।

हर साल लाखों टन कोयला, लोहा और अन्य खनिज झारखंड से देश और विदेश भेजा जाता है।
लेकिन विडंबना यह है कि इन खदानों के पास बसे गाँव आज भी साफ पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।
“धरती का सोना तो निकल गया, पर गाँव की झोपड़ी में अंधेरा आज भी वैसा ही है।”
यह एक खनिक के शब्द हैं, जो झारखंड की सच्चाई बयां करते हैं।
विकास के नाम पर विनाश
खनन ने झारखंड को रोजगार तो दिया, लेकिन बदले में पर्यावरण की भारी कीमत चुकानी पड़ी।
जहाँ पहले हरे-भरे जंगल हुआ करते थे, वहाँ अब धूल, धुआँ और गड्ढों का साम्राज्य है।
सैकड़ों गाँव खदानों के कारण उजड़ चुके हैं। विस्थापन की पीड़ा झारखंड के कई जिलों की पहचान बन गई है।
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो दशकों में झारखंड में 2 लाख से अधिक परिवार खनन परियोजनाओं के कारण विस्थापित हुए हैं।
परंतु इनमें से बहुत कम को ही मुआवज़ा और पुनर्वास मिला है।
उद्योग आए, पर रोज़गार नहीं
झारखंड की धरती पर उद्योगों के नाम पर बड़े-बड़े संयंत्र तो बने,
लेकिन स्थानीय युवाओं के लिए रोज़गार की स्थिति बेहद निराशाजनक रही।
अक्सर नौकरियाँ बाहरी राज्यों के लोगों को दी जाती हैं, जबकि झारखंड के युवाओं को ठेका या अस्थायी मजदूरी पर रखा जाता है।
यह सवाल आज भी अनुत्तरित है —
“जब संसाधन झारखंड के हैं, तो विकास का लाभ बाहर वालों को क्यों?”
शिक्षा और स्वास्थ्य — अब भी पिछड़े मोर्चे पर
झारखंड के खनन क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति बेहद चिंताजनक है।
जहाँ खदानों से करोड़ों की कमाई होती है, वहीं आस-पास के गाँवों में बच्चे अब भी मिट्टी के फर्श पर बैठकर पढ़ते हैं।
अस्पतालों की हालत इतनी खराब है कि मामूली बीमारी में भी लोगों को रांची या धनबाद का रुख करना पड़ता है।
राजनीति और जनता — 25 साल का असंतुलन
झारखंड की राजनीति हमेशा अस्थिरता की शिकार रही है।
25 सालों में राज्य में अब तक 11 मुख्यमंत्री बदल चुके हैं।
राजनीतिक अस्थिरता ने नीति-निर्माण को कमजोर किया और विकास की गति को प्रभावित किया।
हालांकि हाल के वर्षों में सड़क, बिजली और सिंचाई के क्षेत्र में कुछ सुधार दिखे हैं, लेकिन ग्रामीण झारखंड अब भी बुनियादी विकास की प्रतीक्षा में है।

झारखंड की पहचान सिर्फ खनिज नहीं, संस्कृति भी है
झारखंड केवल खनन का केंद्र नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति, नृत्य, गीत, त्योहार और भाईचारे की भूमि है।
सरहुल, करम, टुसू, सोहराय जैसे पर्व आज भी झारखंड की आत्मा को जीवित रखते हैं।
यहाँ के आदिवासी समुदाय ने अपनी परंपराओं को बचाए रखा है, और यही झारखंड की असली पहचान है।
“धरती अब भी वही है, लोग अब भी वही हैं,
फर्क बस इतना है — सपनों का झारखंड अब भी अधूरा है।”
आगे की राह — आत्मनिर्भर झारखंड की ओर
अब झारखंड को यह तय करना होगा कि वह अपने संसाधनों का उपयोग कैसे करे।
सिर्फ खनन और निर्यात से नहीं, बल्कि स्थानीय उद्योगों, शिक्षा, कृषि और पर्यावरण संरक्षण के माध्यम से आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाना होगा।
झारखंड के पास क्षमता है, प्रतिभा है और उम्मीद भी —
बस जरूरत है राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनभागीदारी की।
HF News 24 की ओर से झारखंड को 25वें स्थापना दिवस पर नमन
धरती आबा बिरसा मुंडा, सिद्धो-कान्हो और सभी महान सेनानियों को शत-शत नमन।
उनके सपनों का झारखंड तभी साकार होगा जब यहाँ के लोग अपने ही संसाधनों का लाभ पा सकेंगे।
“अबुआ डिसुम, अबुआ राज – एतेमारा राज!”
(हमारा देश, हमारा राज – यही हमारा राज्य है)
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